क्या मनुष्य समानुभूती (Empathy) खो रहा है ?

" यह चल क्या रहा है ? "
"क्या इस पूरी दुनिया पर मनोविकृत (Psychopath) व्यक्ती, महा-अहंकारी (Egomaniac) लोग, बुरे परग्रहवासी/एलियंस या शायद अमानवीय शक्तियों ने नियंत्रण कर लिया है ? क्या कोई असुर चोरीछुपे मनुष्य के मस्तिष्क के साथ खेल रहा है ? किस के हाथों में पूरी तरह से इस दुनिया की बागड़ोर है ?"

आज लगभग पूरी दुनिया के वर्तमान हालात को देखते हुए, यह असंभव है कि आपके मन में ऐसे प्रश्न न उठे, चाहे आप उसपर सोचे रहें हो या खुलकर लोगों के साथ करे रहे हो | अगर आप अपनी हर दिन की व्यस्त दिनचर्या से कुछ चंद पल निकालें और ध्यान से विश्लेषण करें तो " पर्यावरण सुरक्षा ", संसाधनों का बँटवारा, (वैश्विक-)राजनीति, सहयोग, विकास/सुधार, टेक्नोलॉजी/तकनिकी, विचारधारा, धर्म/जाति और अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर या नाम पर " फ़ायदा पहले, लोग बाद में ", आत्मविश्वास, गैर-ज़िम्मेदारी, उग्रवाद, लापरवाही, महत्वाकांक्षा, कट्टरता, धोखाधड़ी, लूटपाट, भड़काना, पाखंड, शोषण, स्वार्थ, घमंड का कपट का स्तर कितना है | मौसम, समाज, जीवनशैली, रिश्ते-नाते और इंसानी व्यवहार के मामले में, आज बहुत से लोग आज की दुनिया (समय) को उस दुनिया (समय) से बहुत अलग पाते हैं जिसमें उनका जन्म हुआ था, भले ही वह जन्म कुछ ही दशक पहले हुआ हो ! बाकी लोगों की बात छोड़िए ! आपकी क्या राय है ? आज की दुनिया आपको कैसी लगती है ?

शायद यही मुख्य कारण हो सकता है कि आज दुनिया भर में करोड़ो लोगों में आज से पहले कभी नहीं देखी गई उतनी झपट, डर, गुस्सा, द्वेष, निराशा, तनाव, बेचैनी, हताशा, सुस्ती, भूलने की बीमारी, नींद न आना, बुरी लत, व्यर्थता का अनुभव, सुखवाद, पलायनवाद, असुरक्षा, एकरसता, अकेलापन, असहिष्णुता, भटकाव, मोहभंग, उदासीनता, अनिश्चितता, अधीरता, संवेदनशीलता, उत्साह की कमी, लक्ष्यहीनता, बेबसी, निराशावाद, उद्देश्यहीनता, भोगीपन, अंधकारमय भविष्य का डर, " कोई अर्थ ही नहीं " यह भावना, धोखा खाए जाने का भावना, जीने का डर और सबसे महत्वपूर्ण - विश्वास में कमी इन में व्यापक प्रसार या बढ़ोतरी देखी जा रही है | क्या आप भी उन लोगों में से एक नहीं हैं ? क्या आपको पक्का विश्वास है ? ज़रा विचार कीजिए ! एक पल के लिए शांत बैठ जाइए और पूरी गंभीरता से खुद से यह प्रश्न पूछिए | भला वह क्या है जिस पर से लोगों का विश्वास उठ रहा है ? आप के मन में जो भी नाम आए वही है !

"हर (बहोत) मनोविकृत (Psychopath) व्यक्ति एक आत्मपूजक (Narcissist) होता है, पर हर (बहोत) आत्मपूजक व्यक्ति मनोविकृत नहीं होता |"
नैदानिक मनोविज्ञानी डॉ. रामणी दुर्वासुला
( आत्मपूजक व्यक्तित्व पर दुनिया की अग्रणी विशेषज्ञञ )

अगर आपको पक्का विश्वास है कि किसी मनोविकृत व्यक्ति में मानवीय भावनाएँ होती ही नहीं होतीं तो आप बड़ी भूल कर रहें हैं ( क्षमा किजिए ! ) | वह " मानवीय भावनाओं की कमी " नहीं है जो एक साधारण से दिखने वाले व्यक्ति को एक अनैतिक, पत्थरदिल, लापरवाह, दुराचारी, पश्चातापहीन, गैर-ज़िम्मेदार, धोखेबाज़, अन्यायी, केवल अपने लाभ के बारे में सोचने वाला और दूसरों का शोषण करने वाला परजीवी बनाती है | वास्तविक रूप से, मनोविकृत व्यक्ति में मानवीय भावनाएँ होती हैं पर उन्हें दूसरों की भावनाओं, संवेदनाओं या दुख-दर्द की कोई परवाह नहीं होती | उनमें दूसरे लोगों के लिए या यहाँ तक कि अपने सबसे करीबी लोगों के लिए भी बहुत ही कम या ना के बराबर समानुभूति (Empathy) होती है | क्या पहली बार आप ' समानुभूति ' यह शब्द सुन रहे हैं ? ' समानुभूति ' या ' सम - अनुभूति ' का अर्थ यही है है किसी दूसरे व्यक्ति के समान या एक जैसा होकर अनुभव करना !

अब तक, हो सकता है की आपने कई जगहों पर एक खास शब्द पढ़ा होगा, सुना होगा या उसका उपयोग भी किया होगा | वह शब्द है ' सहानुभूति ' (Sympathy) ! इस शब्द के साथ-साथ हो सकता है की आपने, ' सहानुभूति ' से जुड़े शब्दों जैसे ' सहानुभूति जताना ' (Sympathizing) और ‘सहानुभूति रखने वाला’ (Sympathizer) जैसे शब्दों का प्रयोग किया होगा | हो सकता है कि किसी बार आपने दूसरों के प्रति अपनी सहानुभूति जताई हो या आप खुद किसी के लिए सहानुभूति का स्रोत (Sympathizer) बन गए हों | वास्तविक रूप में, अधिकतर लोग ' सहानुभूति ' (Sympathy) और ' समानुभूति ' (Empathy) इन दो शब्दों को लेकर गड़बड़ी करते हैं | ये दोनों शब्द सुनने में कुछ हद तक एक जैसे लग सकते हैं पर इनके अर्थ एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं | इसलिए इन दोनों शब्दों को और भी स्पष्ट रूप से समझना बेहद आवश्यकता है |

सहानुभूति एक सचेत प्रयास है जिसके द्वारा हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि कोई दूसरा व्यक्ति किन परिस्थितियों से गुज़र रहा है, वह क्या अनुभव कर रहा है, या वह किस अनुभव से गुज़र रहा है | इसके बराबर उल्टा, समानुभूति एक सच्ची पर एक अवचेतन प्रक्रिया है, जिसमें हम ठीक वही भावना अपने भीतर महसूस करते हैं | सहानुभूति के विपरीत, समानुभूति का अर्थ है स्वयम को दूसरे व्यक्ति की स्थान पर रखकर यह अनुभव करने का प्रयास करना कि वह वास्तव में कैसा अनुभव कर रहा है | जब भी कोई व्यक्ति संकट, पीड़ा या कष्ट में होता है तो उसे देखनेवाले दूसरे व्यक्ति की शारीरिक भाषा (चेहरे के हाव-भाव और बैठने-खड़े होने आसान ) और बोलने के सुर-ताल में तुरंत बदलाव आ जाता है | क्या आपके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ ? ज़रा याद करने का प्रयास कीजिए !

सहानुभूति एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक गुण है |
( फोटो सौजन्य: अमेरिकी मानसशास्त्रीय संघठन )

एक तरफ समानुभूति एक सच्चा और स्वाभाविक अनुभव है | जब हमारे आस-पास के लोग आनंद में होते हैं, तो हम भी आनंद का अनुभव करते हैं और जब वे दुखी, उदास, रोते हुए, चिंतित या निराश होते हैं तो हम भी दुख का अनुभव करते हैं | इसी तरह जब दूसरे लोग संकट में होते हैं तो हमें डर लगता है और जब दूसरों पर अन्याय होता है, उनका शोषण होता है या उन्हें पीड़ा दी जाती है तो हमें गुस्सा आता है | सहानुभूति का अनुभव पूरी तरह से स्वाभाविक होता है | इसके अलावा समानुभूति का अनुभव तुरंत ही शरीर के अंदर आंतरिक और रासायनिक बदलावों को शुरू कर देता है | इसी के परिणाम में सहानुभूति की अभिव्यक्ति शारीरिक, वर्तनात्मक और अशाब्दिक होती है |.

दूसरी तरफ, सहानुभूति एक अत्यधिक सचेत प्रक्रिया है जिसमें किसी दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियाँ, चाहे वे वर्तमान की हों या अतीत की, उन के बारे में कल्पना कर के, आकलन कर के या मष्तिष्क के अंदर प्रतिमाएँ रचकर समझने का प्रयास किया जाता है | सहानुभूति शब्दों के द्वारा अभिव्यक्त की जाती है | विशेष रूप से यह सहमति, पुष्टि या समर्थन, दिलासा या प्रोत्साहन के रूप में हो सकती है | हालाँकि, इस प्रक्रिया में आतंरिक पीड़ा या अस्वस्थता का वह सहज अनुभव नहीं होता | इसलिए सहानुभूति का दिखावा किया जा सकता है पर समानुभूति का नहीं !

अपने आवेगों को नियंत्रित करने की क्षमता हमें सभ्य बनाती है पर समानुभूतिपूर्ण व्यवहार के द्वारा ही हम वास्तव में सामाजिक प्राणी बन पाते हैं | जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को अपने भीतर आत्मसात कर लेता है - यह अनुभव करता है कि वह व्यक्ति इस समय क्या अनुभव कर रहा होगा, किन परिस्थितियों का सामना कर रहा है या पहले कर चुका है - तो वे दो व्यक्ति ' एक ' ही हो जाते हैं |

इसके अलावा, पहला व्यक्ति बिना कुछ कहे और शारीरिक रूप से उस दूसरे व्यक्ति की सहायता कर सकता है, उसे सांत्वना दे सकता है, उसे संकट से बाहर निकाल सकता है, उसकी रक्षा कर सकता है या यहाँ तक कि उस व्यक्ति की ओर से लड़ भी सकता है जो इस समय किसी समस्या, संकट या पीड़ा में हो |

" अपने आवेगों को नियंत्रित करने की क्षमता हमें सभ्य बनाती है पर समानुभूतिपूर्ण व्यवहार के द्वारा ही हम वास्तव में सामाजिक प्राणी बन पाते हैं | "

वह सहानुभूति नहीं बल्कि समानुभूति ही है जो मानवता, नैतिकता और सदाचार की सच्ची नींव बनाए रखती है | दूसरे शब्दों में, दूसरों के प्रति करुणा दिखाना, नियमों का पालन करना, उत्तरदायित्व का चेतना होना, संवेदनशीलता होना, नेकी/सच्चाई, नैतिक निष्ठा और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील व्यवहार करना | लोगों के बीच मानवीय, नैतिक और सैद्धांतिक आचरण में आ रही गिरावट को लेकर दुनिया भर में जो आक्रोश अभी सुनाई दे रहा है वह मूल रूप से इस बात का स्पष्ट संकेत है कि समानुभूति धीरे-धीरे कम होती जा रही है | समानुभूति - वह एक आवश्यक गुण जिसने लाखों वर्षों से हमें एक साथ रहने और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने में सक्षम बनाया है - दुर्भाग्य से, अब विलुप्त होने की कगार पर है |

[ ' आरक्षित ' समानुभूति: किसी भी (सामान्य) व्यक्ति के लिए हर दूसरे इंसान के प्रति समानुभूति रखना एक अत्यंत स्वाभाविक, जन्मजात, सहज या यहाँ तक कि आध्यात्मिक घटना है | ऐसा होते हुए भी, (भू-)राजनीतिक आंदोलन, कट्टरपंथी विचारधारा या कबीलाईपन व्यवस्थागत रूप से अपने अनुयायियों, समर्थकों या सदस्यों को धोखा देने, जान-बूझकर उकसाने या भटकाने करने का प्रयास करती है यह सुनिश्चित करते हुए कि उनकी समानुभूतिपूर्ण प्रतिबद्धता, आचरण, योगदान, संघर्ष या कार्य केवल उसी आंदोलन, विचारधारा या कबीले के अन्य अनुयायियों, समर्थकों या सदस्यों तक ही सीमित या ' आरक्षित ' रहें | ]

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